रात की नीरवता में, श्रेया बालकनी में खड़ी थी। हल्की ठंडी हवा उसके बालों से खेल रही थी, लेकिन उसके मन में खलबली मची थी। आरव के शब्द बार-बार उसके कानों में गूंज रहे थे—
"कभी-कभी कुछ रिश्ते नाम से परे होते हैं। उन्हें परिभाषा की ज़रूरत नहीं होती।"

रात की नीरवता में, श्रेया बालकनी में खड़ी थी। हल्की ठंडी हवा उसके बालों से खेल रही थी, लेकिन उसके मन में खलबली मची थी। आरव के शब्द बार-बार उसके कानों में गूंज रहे थे—
"कभी-कभी कुछ रिश्ते नाम से परे होते हैं। उन्हें परिभाषा की ज़रूरत नहीं होती।"

Write a comment ...
Write a comment ...