वर्मा मेंशन
देर रात — लगभग 11 बजे
एक नई-नवेली दुल्हन के भारी और खूबसूरत जोड़े में लिपटी काव्या ने वर्मा मेंशन के सबसे शानदार कमरे में कदम रखा। कुछ लड़कियां उसे दरवाजे तक छोड़ने आई थीं, लेकिन अब वो उस बड़े से कमरे में बिल्कुल अकेली थी।
अंदर आते ही उसकी नज़रें चारों ओर घूमने लगीं। कमरे की हर एक बारीकी किसी महल जैसी लग रही थी—विलासिता और शान-ओ-शौकत की जीती-जागती मिसाल। वहां रखा हर एक फर्नीचर और सजावट का सामान बता रहा था कि वर्मा परिवार की दौलत कितनी अथाह है।
ठीक सामने एक बड़ा सा किंग-साइज बेड था, जिसे ताजे फूलों की चादर से सजाया गया था। सफेद रंग के शानदार पर्दे उसके चारों ओर गिर रहे थे, जो फर्श पर बिखरी गुलाब की पंखुड़ियों और खुशबूदार मोमबत्तियों के साथ पूरी तरह जंच रहे थे। पूरे कमरे की हवा में फूलों की एक भीनी-भीनी महक घुली हुई थी।
अपने भारी दुपट्टे को संभालते हुए काव्या थोड़ा और अंदर की तरफ बढ़ी। तभी उसकी नज़र बिस्तर के ठीक ऊपर टंगी एक बड़ी सी तस्वीर पर पड़ी—और पल भर के लिए जैसे उसकी दिल की धड़कन ही रुक गई। यह वही था... वो आदमी जिससे अभी कुछ ही घंटों पहले उसकी शादी हुई थी।
आर्यन वर्मा।
वह लगभग २६ या २७ साल का रहा होगा। गेहुँआ रंग, गहरी भूरी आँखें, और उसके तीखे जबड़े पर दाढ़ी की हल्की सी छाया। उसके होंठ गहरे और तराशे हुए लग रहे थे। तस्वीर साइड पोज़ में थी, इसलिए चेहरे के भाव पूरी तरह साफ नहीं थे, फिर भी उसकी शख्सियत में कुछ ऐसा चुंबकीय आकर्षण था जो किसी को भी बांध ले।
बस एक नज़र, और काव्या को लगा जैसे उसके दिल ने खुद को पूरी तरह से आर्यन के हवाले कर दिया हो।
शादी के लहंगे में सजी काव्या को ऐसा लग रहा था जैसे उसका कोई बहुत खूबसूरत सपना हकीकत में बदल गया हो। उसके चेहरे के इर्द-गिर्द बिखरी कोमल लटें, नाक में सजी नथ, और उसके शरीर पर दमकते गहने—इन सबने उसे किसी अप्सरा जैसा रूप दे दिया था।
पर इस सारी चमक-धमक के पीछे, उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। एक अजीब सी घबराहट थी। उसे अपनी सहेलियों की चिढ़ाने वाली बातें याद आने लगीं:
"सुना है आर्यन वर्मा बहुत सख्त इंसान हैं... एकदम फालतू बात न करने वाले। उनकी आँखें शब्दों से ज्यादा बोलती हैं। आज तक उनका नाम किसी लड़की के साथ नहीं जुड़ा! तुम्हारी किस्मत बहुत अच्छी है काव्या—उनका सारा प्यार बस तुम पर ही लुटेगा!"
इस ख्याल भर से ही काव्या के होंठों पर एक शर्मीली सी मुस्कान आ गई।
लेकिन तभी एक और बात उसके कानों में गूंजी, जिसने उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ा दी:
"दुनिया भर की लड़कियां उनके लिए पागल हैं! ३००० से ज्यादा रिश्ते आए थे उनके लिए—और उन्होंने हर दिल को कांच की तरह तोड़ दिया... एकदम बेरहम और पत्थर दिल इंसान हैं वो।"
ये याद आते ही काव्या के पेट में होने वाली मीठी गुदगुदी एक अजीब सी बेचैनी में बदल गई।
कांपते हुए हाथों से अपने सीने को थामे, वह उस फूलों से सजे बिस्तर पर बैठ गई। उसका दिमाग अनगिनत सवालों और ख्यालों में उलझा हुआ था। क्या आर्यन उसे प्यार करेगा? क्या वो उसे अपनी पत्नी के रूप में अपनाएगा भी?
इन्हीं चिंताओं में घिरी काव्या ने अपना लंबा घूंघट चेहरे पर गिरा लिया और बिस्तर के बीचो-बीच सिकुड़ कर बैठ गई। उसे बस अब आर्यन का इंतज़ार था।
वक्त जैसे थम सा गया था। हर कुछ मिनटों में, वो छुप-छुप कर दीवार घड़ी को देखती। मन ही मन प्रार्थना करती कि बस अब दरवाजे पर उनके कदमों की आहट सुनाई दे जाए।
लेकिन उस कमरे का सन्नाटा डराने वाला था।
रात के १:०० बज गए।
काव्या ने आखिरकार अपना घूंघट पूरी तरह से हटाया और बेकरारी से घड़ी को देखा।
"कहाँ हैं आप? अभी तक घर नहीं आए?" वो उस खाली कमरे में धीरे से फुसफुसाई।
घर में सबने कहा था कि वो ११:३० तक आ जाएंगे... लेकिन उनका तो कोई नामो-निशान ही नहीं था।
क्या वो ठीक होंगे?
डर काव्या के दिल में घर करने लगा था, लेकिन वो कर भी क्या सकती थी? उस अनजान और विशाल मेंशन की भारी दीवारों के बीच वो बिल्कुल अकेली थी। इतनी रात गए न तो वो किसी से कुछ पूछ सकती थी और न ही किसी को ढूंढने बाहर जा सकती थी।
चुपचाप, उदास मन से उसने खुद को फिर से घूंघट में ढक लिया।
अगली बार जब उसकी आँखें खुलीं, तो कमरे में सुबह की रोशनी आ चुकी थी और घड़ी में ७ बज रहे थे।
पूरी रात बिना पलक झपकाए इंतज़ार में गुज़र गई थी। रोने और जागने की वजह से उसकी आँखें लाल हो गई थीं।
सुबह ७:१५ बजे।
तभी दरवाजे का हैंडल घूमने की आवाज़ आई।
और वो वहां था।
आर्यन।
आर्यन वर्मा।
जैसे ही उसने कमरे में कदम रखा, काव्या का दिल किसी पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा।
आर्यन की नज़रें एक पल के लिए उस पर पड़ीं—एकदम सर्द और भावहीन—और अगले ही पल उतनी ही तेजी से हट भी गईं। बिना एक भी शब्द कहे, वो अलमारी की ओर बढ़ा और अपने कपड़े निकालने लगा। वो सीधा वॉशरूम की तरफ जा रहा था जब काव्या ने आखिरकार अपनी हिम्मत जुटाई।
"सुनिए......"
वो रुक गया, लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
कांपते हाथों से अपना घूंघट थोड़ा ऊपर उठाते हुए काव्या ने पूछा, "आप... आप पूरी रात घर नहीं आए??"
आर्यन ने जवाब दिया, पर उसकी आवाज़ में एक अजीब सा तीखापन और रूखापन था, "क्यों? तुम्हें किसी चीज़ की ज़रूरत थी?"
उसका ये सवाल काव्या को किसी तमाचे जैसा लगा। वो शब्दों के लिए लड़खड़ा गई। धीरे से बिस्तर से नीचे उतरी और झिझकते हुए उसके पास पहुंची।
उसके सामने खड़े होकर, आर्यन की गहरी और सख्त नज़रों का सामना करते हुए, वो हकलाते हुए बोली, "वो... कल रात हमारी सुहागरात थी???"
लेकिन इससे पहले कि वो अपनी बात पूरी कर पाती, आर्यन ने उसे बीच में ही टोक दिया। उसकी आवाज़ में जैसे बर्फ सी ठंडी नफरत घुली थी:
"तुम्हें मेरे साथ सुहागरात मनानी थी?"
शर्म से पानी-पानी होते हुए काव्या ने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं। "नहीं, नहीं! मेरा वो मतलब नहीं था! मैं बस परेशान थी... क्या आप नाराज़ हैं?"
बिना किसी हिचकिचाहट के, आर्यन गुर्राया, "तुम्हारी ये शक्ल ही मेरा पूरा दिन बर्बाद करने के लिए काफी है!"
उसके शब्दों की कड़वाहट काव्या के दिल के आर-पार हो गई। उसने अपने भारी लहंगे को कसकर मुट्ठी में भींच लिया, ताकि आँखों में आए आंसुओं के सैलाब को बहने से रोक सके।
फिर भी, उसके अंदर की उस मासूम लड़की को एक उम्मीद थी। "सुनिए," उसने बहुत कमज़ोर आवाज़ में फिर से पुकारा।
आर्यन वहीं रुक गया, उसकी मुट्ठियाँ गुस्से से भींच गई थीं। एक पल के लिए उसने अपनी आँखें बंद कीं, जैसे खुद के ही गुस्से पर काबू पाने की कोशिश कर रहा हो। फिर अपने बालों में झल्लाहट से हाथ फेरते हुए बोला,
"अब क्या है?"
काव्या ने अपनी बची-खुची हिम्मत बटोरी। उसकी आवाज़ दिल के उस भारी बोझ से कांप रही थी, "क्या मैं इतनी बदसूरत हूँ? क्या मेरे चेहरे में कोई ऐसी खराबी है कि मुझे देखते ही आपका मूड खराब हो जाता है... आपका पूरा दिन बर्बाद हो जाता है? आप इतना कड़वा क्यों बोल रहे हैं? आखिर मैंने किया क्या है?"
एक पल के लिए आर्यन सन्न रह गया।
वो पीछे मुड़ा और अपनी गुस्से से सुलगती हुई आँखें सीधा काव्या की नम आँखों में गड़ा दीं।
दांत पीसते हुए, उसने कहा, "तुम्हारी सबसे बड़ी गलती थी इस शादी के लिए 'हाँ' कहना। मेरे साफ इनकार करने के बावजूद, तुम पीछे नहीं हटीं! और अब, तुम्हें अपनी उस गलती की कीमत चुकानी होगी—पूरी ज़िंदगी।"
काव्या वहीं पत्थर की तरह खड़ी रह गई। उसकी सांसें जैसे गले में ही अटक गई थीं। आर्यन का हर एक शब्द उसके दिल के टुकड़े-टुकड़े कर रहा था।
आर्यन की नज़र उस सजे हुए सुहागरात के बिस्तर की ओर गई। उसके होंठों पर एक बेहद क्रूर सी मुस्कान तैर गई और उसने ताना मारते हुए कहा,
"तुम पूरी रात मेरा इंतज़ार कर रही थीं, है न? वहां उस सुहागरात के बिस्तर पर बैठकर, किसी परियों वाली कहानी के सपने बुन रही थीं... खैर, तुम्हें निराश करने के लिए माफी चाहता हूँ। सुहागरात की बात तो भूल ही जाओ—आर्यन वर्मा को छूना तुम्हारे लिए हमेशा बस एक सपना ही रहेगा।"
काव्या की तरफ मुड़कर देखे बिना, वो सीधा बाथरूम में चला गया। और काव्या वहीं खड़ी रह गई... टूटी हुई, बिखरी हुई, और अंदर तक अपमानित।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था—आखिर उसने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया था? ऐसा क्या किया था उसने कि उसे उस आदमी से इतनी नफरत मिल रही थी जिसके साथ उसने अपनी पूरी ज़िंदगी बिताने के हसीन सपने देखे थे?
कुछ मिनट बीत गए। शायद बीस मिनट।
फिर आर्यन बाहर निकला। वो ऑफिस जाने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसने काव्या की मौजूदगी को ऐसे नज़रअंदाज़ किया जैसे वो वहां हो ही न। उसका पूरा ध्यान बस अपने काम पर था।
काव्या ने एक बार फिर अपने टूटते हुए हौसले को समेटा और उसकी ओर कदम बढ़ाए।
धीरे से, रुंधे गले के साथ उसने कहा, "मैं शादी से मना कैसे कर सकती थी? आप भी जानते हैं कि यह शादी किन हालात में हुई है। अगर मैंने ना कहा होता, तो मेरे माता-पिता मुझसे कारण पूछते... मैं उन्हें क्या जवाब देती? मैं उनका दिल कैसे तोड़ सकती थी?"
आर्यन ने उसकी बात सुनी। काव्या जानती थी कि उसने सुना है। लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस शीशे के सामने खड़ा होकर अपनी टाई ठीक करता रहा, अपना कोट पहनता रहा, जैसे काव्या सच में अदृश्य हो।
जैसे ही वो कमरे से बाहर जाने के लिए मुड़ा, काव्या खुद को रोक नहीं पाई।
"कम से कम मुझे बस इतना बता दीजिए," उसने कहा, उसकी आवाज़ अब पूरी तरह से टूट चुकी थी, "मैं घर पर सबको क्या जवाब दूँ? जब वो मुझसे कल रात के बारे में पूछेंगे... तो मैं उन्हें क्या बताऊं? कि आप पूरी रात घर ही नहीं आए?"
आर्यन दरवाजे पर रुक गया। वो पीछे मुड़ा, और उसके चेहरे पर एक तिरछी सी मुस्कान थी—एक ऐसी मुस्कान जो किसी भी जोरदार थप्पड़ से ज्यादा दर्दनाक थी।
"तुमने मुझसे शादी की है," उसने बेहद ठंडे लहजे में कहा, "तो अब यह तुम्हारी समस्या है। अपना रास्ता खुद निकालो। आर्यन वर्मा किसी को भी सफाई देने का मोहताज नहीं है... और इस दुनिया में किसी की इतनी हैसियत नहीं कि वो मुझसे सवाल कर सके।"
इतना कहकर वो वहां से चला गया। और काव्या वहीं बेसुध सी खड़ी रह गई, उसके सारे सपने उसी फर्श पर कांच की तरह बिखरे पड़े थे।
उसकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली।
उसने प्यार का, एक नई शुरुआत का, अपनाए जाने का सपना देखा था... लेकिन बस एक ही रात में, उसका सब कुछ कुचल दिया गया था। जो बचा था, वह था सिर्फ हकीकत का एक दर्दनाक और कड़वा सच।
उसी समय नीचे हॉल में...
आर्यन सीढ़ियों से नीचे उतरा। वहां उसकी मां, सृष्टि वर्मा, एक पारिवारिक मित्र रागिनी आंटी के साथ बैठी हंस-बोल रही थीं।
अपने बेटे को इतनी सुबह और वो भी फॉर्मल कपड़ों में तैयार देखकर सृष्टि हैरान रह गईं।
"आर्यन? तुम इतनी जल्दी जा रहे हो? ऑफिस के लिए तैयार भी हो गए? आखिर जा कहाँ रहे हो तुम?"
बिना उनके पास रुके, आर्यन ने सपाट स्वर में कहा, "ऑफिस।"
सृष्टि ने घबराकर उसे रोकने की कोशिश की। "लेकिन बेटा, आज तो 'पग-फेरे' की रस्म है न। तुम्हें काव्या के घर जाना है..."
इससे पहले कि वो अपनी बात पूरी कर पातीं, आर्यन ने चिढ़कर उन्हें बीच में ही काट दिया, "मेरे पास इन फालतू के रस्मो-रिवाज़ों के लिए कोई वक्त नहीं है।"
वो बिना एक भी शब्द कहे वहां से चला गया, और सृष्टि बस हक्की-बक्की उसे जाते हुए देखती रह गईं।
उनका दिल भारी हो गया। उन्हें लगा था कि शादी के बाद शायद आर्यन बदल जाए, शायद काव्या का प्यार उसके पत्थर हो चुके दिल को पिघला दे।
लेकिन कुछ नहीं बदला था। सब वैसा ही था।
उधर ऊपर कमरे में, काव्या आईने के सामने खड़ी तैयार हो रही थी—हालांकि उसे खुद नहीं पता था कि वो किसके लिए तैयार हो रही है। उसके चेहरे पर न तो कोई चमक थी, न खुशी, न ही किसी नई दुल्हन वाला वो निखार।
तभी कमरे का दरवाजा खुला और सृष्टि माँ अंदर आईं।
अंदर आते ही उनकी नज़र उस अछूते सुहागरात के बिस्तर पर पड़ी। फूलों की सजावट अभी भी वैसी की वैसी थी, बस फूल थोड़े मुरझा गए थे।
सृष्टि को काव्या से कुछ भी पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी; वो एक ही पल में सब कुछ समझ गईं।
काव्या उन्हें देखते ही उनकी ओर दौड़ी और उनके पैर छूने के लिए झुकी।
सृष्टि ने प्यार से उसे बीच में ही रोक लिया और भारी आवाज़ में बुदबुदाईं, "तुम्हें यह सब करने की ज़रूरत नहीं है, बेटी।"
काव्या ने अपने आंसू छिपाने के लिए नज़रें झुका लीं और एक फीकी सी मुस्कान अपने चेहरे पर ले आई।
तभी एक नौकर ने कमरे का दरवाजा खटखटाया।
"जी, आर्यन बाबा अपना वॉलेट भूल गए हैं। उन्होंने कहा है कि कोई उसे नीचे पार्किंग में ले आए।"
पूरे घर में सृष्टि माँ के अलावा किसी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो आर्यन के सामान को हाथ भी लगा सके।
लेकिन आज, सृष्टि काव्या की ओर मुड़ीं और बहुत प्यार से बोलीं, "जाओ, बेटा। उन्हें दे आओ। अब तुम उनकी पत्नी हो।"
ये सुनते ही काव्या के अंदर घबराहट की एक लहर दौड़ गई।
"लेकिन... मैं कैसे? सासू माँ???"
सृष्टि मुस्कुराईं और उन्होंने अपना हाथ तसल्ली देते हुए काव्या के हाथ पर रख दिया। "अब तुम्हें ही ये सब करना होगा, काव्या। यह तुम्हारा हक़ है... और तुम्हारी ज़िम्मेदारी भी।"
कांपते हुए हाथों से काव्या ने वो वॉलेट उठाया और नीचे पार्किंग एरिया की ओर चल दी।
वो वहां था। अपनी कार के अंदर बैठा हुआ, बेसब्री से अपनी उंगलियां स्टीयरिंग व्हील पर थपथपा रहा था।
जैसे ही आर्यन ने काव्या को अपनी तरफ आते देखा—वो भी उसके वॉलेट के साथ—उसके चेहरे पर फिर से एक गहरा गुस्सा उतर आया।
वो गुस्से से तमतमाता हुआ कार से बाहर निकला। उसकी मुट्ठियाँ भींची हुई थीं।
काव्या ने डरते-डरते वो वॉलेट उसकी ओर बढ़ा दिया। "सुनिए... आपका वॉलेट..."
लेकिन इससे पहले कि वो कुछ और कह पाती, आर्यन ने अपनी जेब से एक लाइटर निकाला।
और अगले ही खौफनाक पल में, उसने लाइटर जलाया और उसकी आग सीधा उस वॉलेट के नीचे लगा दी।
देखते ही देखते वो वॉलेट धू-धू कर जलने लगा।
काव्या की तो जैसे सांस ही अटक गई। वो दहशत में बस उन आग की लपटों को नाचते हुए देखती रह गई, जो इस वक्त उन दोनों के बीच
जल रही थीं।
जिस आदमी से उसने शादी की थी, वो सिर्फ नाराज़ नहीं था। वो सिर्फ पत्थर दिल इंसान नहीं था।
वो... एक विनाशकारी तूफ़ान था।
और काव्या... वो बस उस तूफ़ान के रास्ते में खड़ी एक बेबस और टूटी हुई लड़की थी।









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